जिनके मन में ये प्रश्न हैं कि संघ क्या हैं? कैसे काम करता है? इन सभी प्रश्नों का उतर है 'तत्त्वमसि'
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चंद्रशेखर
December 22, 2025
पुस्तक समीक्षा
तत्त्वमसि
लेखक: श्रीधर पराड़कर
मूल्य : 350 रुपए
श्रीधर पराडकर
पृष्ठ : 176
प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन मेहता मेन्शन, आसफ अली, दरियागंज, दिल्ली
जिनके मन में ये प्रश्न हैं कि संघ क्या हैं? कैसे काम करता है? किस उद्देश्य को लेकर चलाया जा रहा हैं? स्वयंसेवक, संघ कार्यकर्ता और प्रचारक कौन होते हैं? आदि आदि..! इन सभी प्रश्नों का उतर है 'तत्त्वमसि' उपन्यास ।
यह केवल एक उपन्यास नहीं है बल्कि वह ऐतिहासिक कृति है, जिसे आगामी पीढ़ी एक बड़े 'रेफरेंस' के तौर पर पढ़ेगी। कृति लेखक श्रीधर पराड़कर प्रशंसा के पूर्ण अधिकारी हैं। उन्होंने संघ और उसकी पूरी कार्य पद्धति को बड़ी बारीकी से बताया है।
'तत्त्वमसि' के माध्यम से संघ सहित उसके कार्य, शाखा, स्वयंसेवक और प्रचारक के जीवन से जुड़े हर छोटे बड़े पहलुओं के बारे में बहुत गहराई से जानने और समझने को मिला। उपन्यास में कई प्रसंग ऐसे आए हैं जिन्होंने बहुत भावुक भी किया। वहीं, मुख्य पात्र परितोष बाबू ने बतौर एक प्रचारक जीवन के अपने अनुभवों को यूं प्रस्तुत किया जिसे पढ़कर वास्तविकता में आप एक बार ठहरकर सोचने पर अवश्य बाध्य होंगे।
परितोष बाबू के माध्यम से उनके आसपास घूमते पात्र हर अध्याय में एक नए प्रश्न के साथ होते हैं, जिसका उत्तर ही इस उपन्यास की यात्रा को बहुत रोचक बनाता है। भाषा शैली सरल व आकर्षक है। पूरे उपन्यास में यह लगता रहा कि मेरी ये यात्रा 'प्रचारक' के साथ हो रही है। एक ऐसी यात्रा जहां सवाल तो मैं कर रही हूं? किंतु उसके जवाब वे अलग-अलग पात्र दे रहे हैं जिसे लेखक ने शब्द शिल्पी बनकर गढ़ा है।
तत्त्वमसि
लेखक: श्रीधर पराड़कर
मूल्य : 350 रुपए
श्रीधर पराडकर
पृष्ठ : 176
प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन मेहता मेन्शन, आसफ अली, दरियागंज, दिल्ली
जिनके मन में ये प्रश्न हैं कि संघ क्या हैं? कैसे काम करता है? किस उद्देश्य को लेकर चलाया जा रहा हैं? स्वयंसेवक, संघ कार्यकर्ता और प्रचारक कौन होते हैं? आदि आदि..! इन सभी प्रश्नों का उतर है 'तत्त्वमसि' उपन्यास ।
यह केवल एक उपन्यास नहीं है बल्कि वह ऐतिहासिक कृति है, जिसे आगामी पीढ़ी एक बड़े 'रेफरेंस' के तौर पर पढ़ेगी। कृति लेखक श्रीधर पराड़कर प्रशंसा के पूर्ण अधिकारी हैं। उन्होंने संघ और उसकी पूरी कार्य पद्धति को बड़ी बारीकी से बताया है।
'तत्त्वमसि' के माध्यम से संघ सहित उसके कार्य, शाखा, स्वयंसेवक और प्रचारक के जीवन से जुड़े हर छोटे बड़े पहलुओं के बारे में बहुत गहराई से जानने और समझने को मिला। उपन्यास में कई प्रसंग ऐसे आए हैं जिन्होंने बहुत भावुक भी किया। वहीं, मुख्य पात्र परितोष बाबू ने बतौर एक प्रचारक जीवन के अपने अनुभवों को यूं प्रस्तुत किया जिसे पढ़कर वास्तविकता में आप एक बार ठहरकर सोचने पर अवश्य बाध्य होंगे।
परितोष बाबू के माध्यम से उनके आसपास घूमते पात्र हर अध्याय में एक नए प्रश्न के साथ होते हैं, जिसका उत्तर ही इस उपन्यास की यात्रा को बहुत रोचक बनाता है। भाषा शैली सरल व आकर्षक है। पूरे उपन्यास में यह लगता रहा कि मेरी ये यात्रा 'प्रचारक' के साथ हो रही है। एक ऐसी यात्रा जहां सवाल तो मैं कर रही हूं? किंतु उसके जवाब वे अलग-अलग पात्र दे रहे हैं जिसे लेखक ने शब्द शिल्पी बनकर गढ़ा है।