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जीवन का तिल-तिल राष्ट्र-यज्ञ में समिधा रूप होम कर दिया

By चंद्रशेखर December 22, 2025
पुस्तक समीक्षा
जीवन का तिल-तिल राष्ट्र-यज्ञ में समिधा रूप होम कर दिया
जीवन का तिल-तिल राष्ट्र-यज्ञ में समिधा रूप होम कर दिया
‘‘...और यह जीवन समर्पित’’ पुस्तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 24 उन प्रचारकों की जीवन-गाथा का संकलन है जिन्होंने अपने जीवन का तिल-तिल राष्ट्र-यज्ञ की ज्वाला में समिधा बनकर ‘इदं राष्ट्राय इदं न मम’ के मंत्र के साथ होम कर दिया। तप:पूत याज्ञिक की तरह राष्ट्र की दशा को देखा और दिशा देने के लिए आहुति बन गए। कुशल बटुक की तरह समाज से राष्ट्र निर्माण के योग्य समिधा को एकत्रित कर उसे स्वयं के साथ हव्य बना दिया। परतंत्र देश में अनेक प्रकार के परकीय तथा स्वकीय विरोधों के बीच यज्ञ-योग्य सामग्री का संकलन आसान नहीं था। ‘तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित’ केवल गाने के लिए नहीं गाया, उसे चरितार्थ किया। उसे जीवन का साधन बनाया तो साध्य की चिंता नहीं की। विश्वास दृढ़ था कि ‘‘पतवार चलाते जायेंगे, मंजिल आएगी आएगी।’’ राजस्थान में संघ कार्य को खड़ा करने तथा विस्तार करने के लिए 1941 में श्री गुरुजी ने विश्वनाथ लिमये को भेजा। उनसे पूर्व 1940 में बच्छराज जी व्यास ने डीडवाना में शाखा लगाई थी। 1942 में बच्छराज जी व्यास कार्य विस्तार की दृष्टि से राजस्थान आए तो यहाँ एकमात्र प्रचारक विश्वनाथ लिमये थे। लिमये जी ने ही संघ की विधिवत शाखा का प्रारंभ अजमेर में किया। अजमेर की ‘चंद्रकुण्ड शाखा’ लिमये जी के प्रयासों से प्रारंभ हुई और यह राजस्थान की प्रथम विधिवत शाखा बनी। राजस्थान के पूर्व क्षेत्र प्रचारक श्री किशन भैया जी इसी शाखा के स्वयंसेवक थे। इस पुस्तक में उन 24 पूर्व प्रचारकों के विषय में लिखा गया है। वे हैं- 1. विश्वनाथ जी लिमये, 2. ब्रह्मदेव जी, 3. सोहन सिंह जी, 4. कृष्णचन्द्र जी भार्गव, 5. लक्ष्मण सिंह जी शेखावत, 6. जयदेव जी पाठक, 7. भाऊ ठाकुरदास जी टंडन, 8. सुंदर सिंह जी भण्डारी, 9. हस्तीमल जी, 10. भंवरसिंह जी शेखावत, 11. सूर्यप्रकाश जी, 12. धनप्रकाश जी त्यागी, 13. नरमोहन जी, 14. गोपीचंद जी अरोड़ा, 15. ज्योतिस्वरूप जी, 16. मोहन जी जोशी, 17. धर्मनारायण जी, 18. माणकचन्द जी, 19. राजाराम जी यादव, 20. मधुसूदन जी, 21. अनिल जी पारीक, 22. सत्यनारायण जी, 23. प्रद्युम्न कुमार जी, 24. सुरेन्द्र सिंह जी। इन ध्येय निष्ठ प्रचारकों ने नित्य के कार्य दैनंदिन शाखा को दृढ़ और विस्तारित करते हुए अनेक नैमित्तिक कार्यों को किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने अनुशासन, सच्चरित्रता, मितव्ययिता, दृढ़ संकल्प, तितिक्षा, योजक स्वरूप, अध्यात्म निष्ठा, वक्तृत्व कला, श्रम साधना, सर्वस्पर्शिता, सर्वसमावेशिता, राष्ट्र निष्ठा, ध्येय निष्ठा, वीतरागिता, सर्व समर्पण, समय पालन, रचनात्मकता, कलाप्रियता, व्यवस्था कौशल्य, प्रसिद्धि पराङ्मुखता, अपरिग्रह, व्यक्ति निर्माण कौशल, सरलता, शुचिता, दानशीलता, निरंतर प्रवास, कार्यकर्ता संभाल, लोकमत परिष्कार, कष्ट सहिष्णुता, राष्ट्रहित के लिए संघर्ष और अनेक प्रकार की यातनाओं के बीच से संघ कार्य को ईश्वरीय कार्य मानकर समरारूढ़ होने की सामथ्र्य आदि गुणों के कारण जाना जाता है। इस पुस्तक में जिन 24 प्रचारकों की जीवन गाथा दी गई है उन लोगों ने इसे प्रत्यक्ष सिद्ध करके दिखलाया। शरीर साधना और अध्यात्म साधना का विरल स्वरूप संघ के प्रचारकों में परिलक्षित होता है। ये प्रचारक अध्ययन में मेधावी थे। जब भारत में साक्षरता मात्र 10 प्रतिशत थी तब ये स्नातक तथा स्नातकोत्तर थे। अनेक प्रचारक समृद्ध परिवारों से थे। कई ने बड़ी नौकरियों का प्रचारक जीवन के लिए परित्याग किया। इनके पारस व्यक्तित्व ने लोहे को सोना बनाया, चंदन ने चंदन बनाया, दीप से दीप जले, गंगा में मिलकर नदियाँ गंगा बनती चली गईं। संघ और विशेष रूप से राजस्थान में संघ कार्य को जानने, समझने और समझाने के साथ ही प्रत्यक्ष उस दिशा में प्रवृत्त होने के लिए तथा दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ते रहने के लिए इस पुस्तक को पढऩा आवश्यक है। इसे संघ के वरिष्ठ, अनुभवी तथा ध्येयनिष्ठ स्वयंसेवकों ने लिखा है। पुस्तक में ‘शुभेच्छा संदेश’ परमपूजनीय सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने लिखा है। प्रस्तावना उत्तर-पश्चिम क्षेत्र (राजस्थान) के क्षेत्र प्रचारक श्री निम्बाराम जी की है। पुस्तक के संपादक द्वय भागीरथ चौधरी जी तथा ब्रजमोहन रामदेव जी ने बड़े श्रमपूर्वक सामग्री का संकलन कर सावधानी के साथ उत्तम संपादन किया है। इसे क्रय करके निश्चित रूप से पढऩा चाहिए। सुंदर प्रकाशन के लिए ‘ज्ञान गंगा प्रकाशन, जयपुर’ बधाई का पात्र है। ...और यह जीवन समर्पित संपादकद्वय : भागीरथ चौधरी ब्रजमोहन रामदेव मूल्य : 350 रुपये पृष्ठ : 360 प्रकाशक : ज्ञान गंगा प्रकाशन न्यू कॉलोनी, जयपुर (राजस्थान) समीक्षक - प्रो० नन्द किशोर पाण्डेय (कुलगुरु, हरिदेव जोशी पत्रकारिता और जनसंचार विश्वविद्यालय, जयपुर)

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