RSS की नींव का वह पत्थर, जो बना विवेकानंद शिला स्मारक का ‘शिल्पी’
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चंद्रशेखर
February 12, 2026
लेख
कन्याकुमारी स्थित विवेकानंद शिला आज भारतीय राष्ट्रबोध और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। लेकिन इस शिला पर स्मारक का निर्माण सहज या स्वाभाविक नहीं था। राजनीतिक विरोध, वैचारिक टकराव, आर्थिक चुनौतियाँ और प्रशासनिक अड़चनें—इन सबके बीच जिस व्यक्ति ने इस असंभव से दिखने वाले कार्य को संभव बनाया, वे थे एकनाथ रानडे जी।
असंभव को संभव बनाने वाला व्यक्तित्व
के. आर. मलकानी अपनी पुस्तक The RSS Story में लिखते हैं कि उन दिनों एक कहावत प्रचलित हो गई थी—
“अगर कभी कुतुबमीनार को उखाड़कर कहीं और ले जाना हो, तो वह काम एकनाथ रानडे ही कर सकते हैं।”
यह कहावत यूँ ही नहीं बनी थी। संघ के सरकार्यवाह रह चुके एकनाथ रानडे जी ने संसद के 323 सांसदों—वह भी सभी दलों और सभी धर्मों से—के हस्ताक्षर जुटाकर संघ-विरोधी केंद्र और राज्य सरकारों के बावजूद विवेकानंद शिला स्मारक की अनुमति प्राप्त की।
बचपन की जिद, जो बनी संकल्प
एकनाथ रानडे जी का स्वभाव बचपन से ही दृढ़ था। उस समय जब बालकों को शाखा में प्रवेश की अनुमति नहीं थी, वे नागपुर में अपने घर के पास लगने वाली शाखा को दीवार पर बैठकर घंटों निहारते रहते थे। यही जिद आगे चलकर संघ के लिए एक मजबूत आधार बनी। जब बच्चों को शाखा में आने की अनुमति मिली, तो पहली टोली में एकनाथ रानडे जी भी शामिल थे।
स्वतंत्रता के बाद जब सरकार ने बच्चों के शाखा में भाग लेने पर आपत्ति जताई तब भी एकनाथ रानडे ने तर्कपूर्ण ढंग से केंद्र को निरुत्तर कर दिया—यदि कांग्रेस सेवादल में बच्चों पर रोक लगे, तभी संघ भी ऐसा करेगा। सरकार के पास इसका कोई उत्तर नहीं था।
संघ प्रचारक के रूप में विस्तार यात्रा
महाराष्ट्र के अमरावती जिले के टिमटिला गांव में जन्मे एकनाथ रानडे जी की शिक्षा नागपुर में हुई। मैट्रिक और स्नातक के बाद वे डॉ. हेडगेवार जी के पास पहुँचे और प्रचारक बनने की जिद पर अड़े रहे। 1938 में उन्हें महाकौशल प्रांत भेजा गया। यहीं उन्होंने हिंदी-मराठी भाषाई टकराव को दूर करने के लिए स्थानीय प्रतिष्ठित व्यक्तियों को संघचालक बनाकर सामाजिक समरसता की मिसाल कायम की।
पूर्वांचल और शरणार्थी सेवा
1950 के बाद उन्हें पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत की जिम्मेदारी मिली। विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के लिए उन्होंने कोलकाता में वास्तुहारा सहायता समिति बनाई। तंबू, भोजन, वस्त्र, चिकित्सा और प्रशिक्षण—हर स्तर पर संगठित सेवा की गई। इससे संघ की जड़ें इस क्षेत्र में मजबूत हुईं।
विवेकानंद शिला स्मारक: जीवन का निर्णायक मिशन
1963, स्वामी विवेकानंद का जन्मशताब्दी वर्ष। गुरु गोलवलकर जी के आग्रह पर एकनाथ रानडे जी को विवेकानंद शिला स्मारक समिति का संगठन मंत्री बनाया गया। शिला पर ईसाई मिशनरियों का दावा, राज्य सरकार का विरोध और केंद्र की चुप्पी—इन सबके बीच रानडे ने जनसमर्थन को हथियार बनाया।
उन्होंने 13 महीनों में देशव्यापी प्रवास किया, सांसदों से संपर्क किया और अंततः 323 सांसदों के हस्ताक्षर जुटाए—जिनमें CPI, मुस्लिम लीग, DMK और नेशनल कॉन्फ्रेंस तक शामिल थीं। यह स्वतंत्र भारत में किसी गैर-सरकारी पहल को मिला अभूतपूर्व समर्थन था।
धन संग्रह की अनोखी योजना
जहाँ 10 लाख रुपये जुटाने पर संदेह था, वहाँ एकनाथ रानडे ने एक रुपये के विवेकानंद चित्र वाले कार्ड और “हर स्कूल से एक पत्थर” की अवधारणा से सवा करोड़ रुपये जुटा लिए। केवल कार्ड बिक्री से ही 30 लाख रुपये एकत्र हुए।
स्मारक से केंद्र तक
सितंबर 1964 में अनुमति मिली और 1970 में स्मारक पूर्ण हुआ। राष्ट्रपति वी. वी. गिरि ने इसका उद्घाटन किया। बाद में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी स्मारक का दर्शन कर एकनाथ रानडे जी की प्रशंसा की।
1972 में उनके प्रयासों से विवेकानंद केंद्र की स्थापना हुई, जिसने देशभर के युवाओं को विवेकानंद के विचारों से जोड़ा।
स्मरणीय विरासत
18 अगस्त 1982 को एकनाथ रानडे जी का निधन हुआ, लेकिन विवेकानंद शिला स्मारक और विवेकानंद केंद्र के माध्यम से उनका व्यक्तित्व आज भी जीवित है। जब तक कन्याकुमारी की वह शिला खड़ी है, तब तक एकनाथ रानडे का नाम भारतीय इतिहास में अमिट रहेगा—एक ऐसे स्वयंसेवक के रूप में, जिसने संगठन शक्ति से राष्ट्र की चेतना को शिला पर उकेर दिया।