भारतीयों के दिमाग से औपनिवेशिक सोच की समाप्ति के लिए स्व का बोध आवश्यक : बाबूलाल
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चंद्रशेखर
March 20, 2026
समाचार › राजस्थान विविध
भारतीयों के दिमाग से औपनिवेशिक सोच की समाप्ति के लिए स्व का बोध आवश्यक : बाबूलाल
जयपुर| भारतीय नववर्ष का आना केवल एक अंक का बदल जाना नहीं है, यह प्रकृति के पुनर्जीवन का समय होता है। भारतीय जीवन दर्शन और इसकी कालगणना प्रकृति के साथ इतने गहरे तक तारतम्य लिए हुए है कि हमारा हृदय भी इसी कालगणना के साथ ही स्पंदन करता है । यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारक बाबूलाल ने शिक्षा संकुल में भारतीय नववर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में कही ।
राजस्थान स्टेट ओपन स्कूल की ओर से भारतीय नव संवत्सर 2083 के उपलक्ष्य में शिक्षा संकुल में ‘केशवार्पणम’ का आयोजन किया गया जिसका शुभारम्भ संघ के जयपुर प्रांत प्रचारक बाबूलाल और राजस्थान स्टेट ओपन स्कूल की सचिव डॉ अरुणा शर्मा ने भारत माता और माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया ।
कार्यक्रम में बोलते हुए मुख्या वक्ता बाबूलाल ने कहा की, आज हम जिसको मनाने के लिए आए हैं, यह वर्ष प्रतिपदा सौभाग्य से राजस्थान की स्थापना का वर्ष भी है। आज हम राजस्थान की स्थापना का सतहत्तरवां वर्ष पूर्ण कर चुके हैं। राजस्थान की स्थापना वास्तव में तो वर्ष प्रतिपदा के दिन संवत 2006 को हुई थी, जब देसी राज्यों का एकीकरण कर दिया था। लेकिन कालांतर में जिनका mind colonized था, उन्होंने उसको याद रखना संभव नहीं था तो उन्होंने उसको 30 March का नाम दिया। आज हम राजस्थान दिवस को वर्ष प्रतिपदा के दिन मनाते हैं तो ऐसा लग रहा है कि हमारा mind है वो decolonized हो रहा है। थोड़ा हम सुधर रहे हैं।
उन्होंने कहा की हिन्दू की पहचान उसका बाहरी आवरण ना होकर उसका आचरण होता है। पूरी दुनिया में जेंटलमेन बनने के लोग ब्यूटी पार्लर जाते हैं, अच्छे कपडे पहनते हैं, अच्छी कटाई करते हैं पर भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां भद्र पुरुष मन की गहराइयों से बनता है। भद्र पुरुष बनने के लिए आपका आचरण ही महत्वपूर्ण है।