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स्व को जगाने की आवश्यकता है: जे. नंदकुमार

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के अंतिम दिन जे. नंदकुमार द्वारा लिखित नेशनल सेल्फहुड इन साइंस नामक पुस्तक पर परिचर्चा

By डॉ. शुचि चौहान January 20, 2026
समाचार › राजस्थान विविध
स्व को जगाने की आवश्यकता है: जे. नंदकुमार
जयपुर में आयोजित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के अंतिम दिन कल चारबाग में जे. नंदकुमार द्वारा लिखित नेशनल सेल्फहुड इन साइंस नामक पुस्तक पर परिचर्चा हुई। इसकी विषयवस्तु को विस्तार देते हुए प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंदकुमार ने बताया कि स्वतंत्रता के संग्राम में समाज जीवन के विविध क्षेत्रों ने अपनी अपनी भूमिका का निर्वहन किया। यह संग्राम केवल राजनैतिक नहीं था अपितु इसमें विज्ञान, कला, साहित्य, पत्रकारिता और समाज के हर क्षेत्र की सक्रिय भूमिका रही थी। प्राचीन ऐतिहासिक या उपनिषद्कालीन विज्ञान की स्थिति को छोड़ दें, तो भी अंग्रेजों के शासनकाल में भी जगदीश चंद्र बोस, रघुनाथ साहा जैसे अनेक वैज्ञानिकों ने अपने-अपने क्षेत्र में वैश्विक स्तर के अनुसंधान किये। खगोल विज्ञान, गणित, भौतिकी, रसायन, चिकित्सा एवं कृषि के क्षेत्र में जो भारत के विशेष अवदान हुए उनको अंग्रेजों एवं गुलाम मानसिकता के भारतीयों ने भी उस रूप में स्वीकार नहीं किया, उसके उलट यह स्थापित करने का षड्यंत्र किया गया कि यहां जो कुछ भी अनुसंधान हुआ है वह अंधविश्वास है, फेक है, अवैज्ञानिक है। जबकि वास्तविकता इसके ठीक उलट है। भारतीय मनीषा के द्वारा की गई खोज सदा से मानव कल्याण के लिए सिद्ध होती रही है। बहुत अधिक पीछे नहीं भी जाएं तो अभी कोरोना काल में भी भारत के द्वारा विकसित की गई वैक्सीन लगभग 100 देशों में नि:शुल्क भेजी गई। विज्ञान के क्षेत्र में जो भी अनुसंधान हुए उन सब के पीछे भी सर्व कल्याण की भावना थी। वैक्सीन को पहुंचाने वाले हवाई जहाजों पर भी जो स्लोगन दिया गया वह यही था - सर्वे संतु निरामया: यही भारत का स्वत्व है। स्वाधीनता के पश्चात भी स्व के तंत्र का जो विकास होना चाहिए 75 वर्ष में वह शेष रह गया। आने वाली पीढ़ी को इस बात का अनुभव कराया जाना बहुत आवश्यक है कि भारतीय विज्ञान में स्व के तत्व के साथ विश्व कल्याण की भावना निहित है, जो संसार में कहीं अन्यत्र देखने को नहीं मिलती। स्वाधीनता के अमृतकाल में इसी स्व को जगाने की आवश्यकता है।

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