रायसेन किले में रानी दुर्गावती का जौहर : 700 वीरांगनाओं ने बच्चों सहित किया अग्नि में प्रवेश
By
रमेश शर्मा
May 07, 2026
लेख
सल्तनतकाल के इतिहास में भारत का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ हमलावरों से अपने स्वत्व और स्वाभिमान की रक्षा के लिये भारतीय नारियों ने अग्नि में प्रवेश न किया हो। फिर कुछ ऐसे जौहर हैं, जिनकी गाथा से आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ऐसा ही एक जौहर रायसेन के किले में 6 मई 1532 को हुआ था, जिसमें सात सौ से अधिक महिलाओं ने अपने छोटे बच्चों के साथ अग्नि स्नान किया था। इस अग्नि की लपटें मीलों दूर तक देखी गई थीं।
यह जौहर महारानी दुर्गावती की अगुवाई में हुआ था। महारानी दुर्गावती मेवाड़ के इतिहास प्रसिद्ध योद्धा राणा संग्राम सिंह की बेटी थीं। स्वाभिमान और स्वत्व रक्षा उनके रक्त की प्रत्येक बूँद में था। वे शस्त्र चलाना भी जानती थीं। चित्तौड़ में उन्होंने वीराँगनाओं की टोली गठित की थी। उनका विवाह रायसेन के शासक शीलादित्य के साथ हुआ था। शीलादित्य ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर के भाई थे। शीलादित्य ने खानवा के युद्ध में राणा संग्राम सिंह के साथ बाबर का मुकाबला किया था। खानवा के युद्ध में भारतीय शासकों का भारी नुकसान हुआ था। खानवा युद्ध के बाद बाबर ने कालिंजर पर धावा बोला और गुजरात के सुल्तानों ने मालवा और रायसेन पर। गुजरात के हमलावर रायसेन के किले को जीत तो न सके पर सैन्य शक्ति बहुत कमजोर हो गई थी। कमजोर शक्ति के बाद भी रायसेन में शीलादित्य की सत्ता बनी रही। तब रायसेन जीतने और लूटने के लिये गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने अपनी कुटिल योजना बनाई। वह धार आया। उसने नालछा में कैंप किया और अनेक भेंट रायसेन भेजीं। महाराजा शीलादित्य को मित्रता संदेश भेजकर धार आमंत्रित किया और धोखे से कैद कर लिया। उन दिनों रायसेन की सीमा उज्जैन और तक लगती थी। उज्जैन में शीलादित्य के भाई लक्ष्मण सिंह किलेदार थे। उन्हें यह समाचार मिला तो वे अपनी सेना लेकर रायसेन की रक्षा के लिये चल दिये। यह समाचार बहादुरशाह को मिला। वह बंदी शीलादित्य को साथ लेकर उज्जैन आया और बंदी शालादित्य को आगे करके उज्जैन पर धावा बोल दिया।
यह घटना दिसम्बर 1531 की है। उज्जैन के रक्षकों ने शीलादित्य को बंदी देखा तो बिना संघर्ष के समर्पण कर दिया। उज्जैन में भारी लूट हुई और स्त्रियों का हरण भी। उज्जैन पर अधिकार करने के बाद उसने यही तरकीब सारंगपुर, आष्टा आदि स्थानों पर अपनाई। फिर विदिशा आया। सभी स्थानों पर जमकर लूट हुई। मंदिर ध्वस्त किये गए और स्त्रियों का हरण हुआ। अंत में वह रायसेन आया। उसने रायसेन किले पर घेरा डाला और बंदी शीलादित्य को भारी यातनाएँ देकर किला समर्पित करने का आदेश दिया। बहादुरशाह ने महारानी दुर्गावती को संदेश भेजा कि वे अपने पूरे रनिवास के साथ समर्पण कर दें। समर्पण की अंतिम बातचीत 4 मई 1532 को हुई। यह प्रस्ताव लेकर बहादुरशाह ने अपने सिपहसालार मलिक शेर को भेजा। उसके प्रस्ताव को महारानी दुर्गावती एवं किले में उपस्थित शीलादित्य के भाई लक्ष्मण सिंह ने अस्वीकार कर दिया और उसे बंदी बनाकर मौत के घाट उतार दिया। महारानी ने जौहर एवं लक्ष्मण सिंह ने साका करने का निर्णय लिया। 5 मई को जौहर की तैयारी आरंभ हुई और 6 मई 1532 को सूर्योदय के साथ ही अग्नि की लपटें धधक उठीं। किले में जितनी स्त्रियाँ थीं, सबको अपने छोटे बच्चों के स्वत्व की चिंता हुई। उन दिनों हमलावर स्त्री और बच्चों को बंदी बनाकर गुलामों के बाजार में बेचा करते थे। सबने अपने छोटे छोटे बच्चों को भी साथ लेकर अग्नि में प्रवेश किया। अग्नि की लपटें आसमान छूने लगीं। जौहर की यह अग्नि दिनभर प्रज्जवलित रही। स्वाभिमानी क्षत्राणियों और उनके सहयोगी सभी स्त्रियों ने समर्पण करने की बजाय बलिदान होने को प्राथमिकता दी। यह रायसेन के इतिहास में पहला जौहर हुआ। इसके बाद रायसेन में हुए दो और जौहरों का उल्लेख मिलता है।
अगले दिन 7 मई प्रातः लक्ष्मण सिंह की कमान में निर्णायक युद्ध हुआ और वे अपनी रक्षा सैन्य टुकड़ी सहित बलिदान हो गए। अंत में दस मई को बहादुरशाह का रायसेन के किले पर आधिपत्य हो गया।
इतिहास की कुछ पुस्तकों में शीलादित्य का नाम सलहदी और लक्ष्मण सिंह का नाम लक्ष्मण सेन लिखा है। कुछ ने यह भी लिखा है कि बहादुरशाह ने शीलादित्य को धोखे से बंदी बनाकर कन्वर्जन करके नाम सलाहुद्दीन कर दिया था। पर बात सही नहीं लगती। यह बात सल्तनकाल के इतिहासकारों ने मन से जोड़ी होगी। यदि शीलादित्य कन्वर्जन कर लेते तो जौहर क्यों होता? साका क्यों होता? जो हो पर रायसेन के किले में इस जौहर का शिलालेख है। आज भी उस स्थल पर स्थानीय नागरिक जाकर शीश नवाते हैं।