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शिक्षा से नौकरी नहीं, बेहतर इंसान बनाना लक्ष्य हो: डॉ. मोहन भागवत

भागवत बोले- सफलता से ज्यादा जरूरी जीवन का सार्थक होना, शक्ति के बिना सत्य भी पंगु

By वीएसके डेस्क September 14, 2026
समाचार › राजस्थान विविध
शिक्षा से नौकरी नहीं, बेहतर इंसान बनाना लक्ष्य हो: डॉ. मोहन भागवत
गोटन (नागौर)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ डिग्री लेकर नौकरी हासिल करना नहीं, बल्कि ऐसे मनुष्य का निर्माण करना होना चाहिए जो श्रेष्ठ, समर्थ और संवेदनशील हो। अपने लिए तो सभी जीते हैं, लेकिन समाज और राष्ट्र के लिए जीने वाला व्यक्ति ही अपने जीवन को सार्थक बना पाता है। वे एल.के. सिंघानिया एजुकेशन सेंटर, गोटन के 37वें वार्षिक पारितोषिक वितरण समारोह ‘स्वराज’ में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि जीवन में सफल होना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है उसका सार्थक होना।
शिक्षा से नौकरी नहीं, बेहतर इंसान बनाना लक्ष्य हो: डॉ. मोहन भागवत

‘नर से नारायण’ बनने की शक्ति विवेक में

डॉ. भागवत ने कहा कि आहार, निद्रा, भय और मैथुन जैसी प्रवृत्तियां पशुओं में भी होती हैं, लेकिन मनुष्य को प्रकृति ने विवेक और विचार की शक्ति दी है। यही शक्ति उसे ‘नर से नारायण’ बनने की दिशा देती है। सद्विचार से प्रेरित कर्म मनुष्य को ऊंचाई पर ले जाते हैं, जबकि गलत दिशा में किया गया कर्म पतन का कारण बनता है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी का निर्माण केवल विद्यालय की चारदीवारी में नहीं होता। परिवार, समाज और आसपास का वातावरण भी उसकी शिक्षा का हिस्सा हैं। विद्यालयीन शिक्षा के साथ संस्कार और आचरण जीवन की असली पाठशाला हैं।

‘शक्ति के बिना सत्य भी पंगु’

सत्य और सामर्थ्य के संबंध पर उन्होंने कहा कि बिना शक्ति के सत्य भी पंगु हो जाता है। व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक शरीर, मन, बुद्धि और ज्ञान का सामर्थ्य जरूरी है। उन्होंने कहा कि आज भारत आर्थिक और सामरिक रूप से मजबूत हुआ है, इसलिए दुनिया भारत के विचार और ज्ञान को गंभीरता से सुन रही है।

किताबी ज्ञान से आगे पंचकोशीय विकास

डॉ. भागवत ने शिक्षा को सर्वांगीण बनाने पर जोर देते हुए कहा कि कला, संगीत, खेल और योग भी शिक्षा के अभिन्न अंग हैं। कबड्डी जैसे खेल हार के बाद फिर खड़े होने का साहस सिखाते हैं, जबकि संगीत सामूहिकता और समन्वय का बोध कराता है। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थान केवल उपाधियां बांटने के केंद्र नहीं, बल्कि मनुष्य निर्माण के तीर्थ बनने चाहिए। विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, चरित्र और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित करना शिक्षा की वास्तविक सफलता है।

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